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Thursday, December 25, 2014

ऐसा क्यों?  
 सीमा स्मृति
कल शाम जब टेलीविजन चलाया ही था कि न्यूज़ आई कि फरीदाबाद के होली चाइल्ड स्कूल के एक तेरह साल के बच्चे ने जो आठवीं क्लास में पढ़ता था उसने स्कूल के बाथरूम में पैट्रोल डालकर अपने को आग लगा ली। मन और सोच जैसे सुन्न पड़ गए। ये क्या है? स्कूल में पानी की बोतल में पैट्रोल डाल कर ले गया । कसूर किस का है? माँ,बाप, टीचर, हमारा एजूकेशन सिस्टम और समाज !कौन है इस घटना का जिम्मेदार ? प्रश्नों का एक सैलाब हिला गया। हम बच्चों को क्या शिक्षा दे रहे हैं?आसान है एक –दूसरे पर दोष मढ़ना ।माँ-बाप आसानी से टीचर को दोषी कह सकते हैं और टीचर के पास एक क्लास में तीस चालीस बच्चे होने का दर्द और हर बच्चे पर वन टू वन ध्यान न दे पाने का कारण । क्या कारण होगा कि एक इतना छोटा बच्चा जिसने अभी जीना भी शुरू नहीं किया,वह जीवन को खत्म करना चाहता है? वह कौन- सा दबाव होगा जो उस इस हद तक सोचने को मजबूर करे?हमारे समाज में,हमारी शिक्षा प्रणाली क्या इतनी संकुचित हो चुकी है? क्या हम बच्चों को रोबोट बना रहे हैं?क्या नम्बर की दौड़ में अंधे हम जीवन को ली देने वाले गहरे काले गड्ढे नहीं देख पा रहे हैं?मन बार -बार उस बालमन की स्थिति की कल्पना नहीं कर पा रहा कि उसे खुद को इस प्रकार दर्द देकर उस दबाब से मुक्ति पाना चाहता था। मन का हर तार, पूर्णत: तार-तार हो रहा है। शायद उस बच्चे के मन की बात समझने की बात तो दूर है , किसी ने उसे कभी सुना ही नहीं। वरना इतना छोटा बच्चा  ऐसे सोच नहीं पाता। वो पैंतालीस प्रतिशत जल गया ,परन्तु अब खतरे से बाहर है पर क्या उसका शेष जीवन खिल सकेगा।? शरीर के दाग चाहे मिट जाएँ पर मन की सलवटें कभी क्या खत्म हो पाएँगी?
हम सभी को सोचना है कि कमी कहाँ है ? यह एक बच्चे कि   बात नहीं यह पूरे सिस्टम का दोष है। इस भाग -दौड़ और पागल भौतिकवादी दौड़  में अंधे हम क्या खो रहे हैं? क्या हमारे पास बढ़िया कपड़े हैं, मोबाइल है,घूमना फिरना, मॉल और पिक्चर सभी कुछ है पाने के चक्कर में हम क्या खो रहे हैं  कभी सोचा। सिर्फ एक बार उस बाल मन के दर्द और दबाव को सोचेगें तो भौतिकता की हर चीज कुरूप नजर आएगी।  हमें क्या बदलना है ,ताकि इस प्रकार फिर कोई मासूम बचपन यूं ना जले।

Thursday, November 27, 2014

मन की बात- ऐसा क्‍यों?

कल शाम जब टेलीविजन चलाया ही था कि न्‍यूज आई कि फरीदाबाद के होली चाइल्‍ड स्‍कूल के एक तेरह साल के बच्‍चे ने जो आठंवी क्‍लास में पढ़ता था उसने स्‍कूल के बाथरूम में पैट्रोल डाल कर अपने को आग लगा ली। मन और सोच जैसे सून पड़ गए। ये क्‍या है? स्‍कूल में पानी की बोतल में पैट्रोल डाल कर ले गया । कसूर किस का है? मां बाप, टीचर, हमारा एजूकेश्‍न सिस्‍टम और समाज कौन है इस घटना का जिम्‍मेदार ? प्रश्‍नों का एक सैलाब हिला गया। हम बच्‍चों को क्‍या शिक्षा दे रहे हैं?आसान है एक –दूसरे पर दोष मंडना । मां-बाप आसानी से टीचर को दोषी कह सकते हैं और टीचर के पास एक क्‍लास में तीस चालीस बच्‍चे होने का दर्द और हर बच्‍चे पर वन टू वन ध्‍यान ना दे पाने का कारण । क्‍या कारण होगा कि एक इतना छोटा बच्‍चा जिसने अभी जीना भी शुरू नहीं किया वो जीवन को खत्‍म करना चाहता है? वो कौन सा दबाव होगा जो उस इस हद तक सोचने को मजबूर करे? हमारे समाज में,हमारी शिक्षा प्रणाली क्‍या इतनी संकुचित हो चुकी है? क्‍या हम बच्‍चों को रोबोट बना रहे हैं? क्‍या नम्‍बर की दौड़ में अंधे हम जीवन को ली देने वाले गहरे काले गढ्ढे नहीं देख पा रहे हैं?मन बार बार उस बाल मन की स्थित की कल्‍पना नहीं कर पा रहा कि उसे खुद को इस प्रकार दर्द देकर उस दबाब से मुक्ति पाना चाहता था। मन का हर तार, पूर्णत: तार-तार हो रहा है। शायद उस बच्‍चे के मन की बात समझने की बात तो दूर है किसी ने उसे कभी सुना ही नहीं। वरना इतना छोटा बच्‍चा यूं सोच नहीं पाता। वो पैंतालीस प्रतिशत जल गया परन्‍तु अब खतरे से बाहर है पर क्‍या उसका शेष जीवन खिल सकेगा।? शरीर के दाग चाहे मिट जाएं पर मन की सलवटें कभी क्‍या खत्‍म हो पाएंगी?
हम सभी को सोचना है कि कमी कहां है ? यह एक बच्‍चे कि  बात़ नहीं यह पूरे सिस्‍टम दोष है। इस भाग दौड़ और मैड मैटिरिलिस्‍टिक रेस में अंधे हम क्‍या खो रहे हैं? क्‍या हम बढि़या कपड़े हैं, मोबाइल है ,घूमना फिरना, मॉल और पिक्‍चर सभी कुछ है पाने के चक्‍कर में हम क्‍या खो रहे हैं  कभी सोचा। सिर्फ एक बार उस बाल मन के दर्द और दबाव को सोचेगें तो भौतिकता की हर चीज कुरूप नजर आयेगी।  हमें क्‍या बदलना है? ताकि इस प्रकार फिर कोई मासूम बचपन यूं ना जले।
सीमा स्‍मृति 

Saturday, February 1, 2014

मेरे ख्‍़वाबों का सफर


नौ माह की अवस्‍था से मेरे दोनों पांव में पोलियो हो गया था। ईश्‍वर की असीम कृपा एवं माता-पिता के अथक प्रयास से मैं जल्‍द ही अपने पांव पर खड़ी हो गई। मुझे बैंक में नौकरी मिल गई। मेरे पिता जी मुझे बचपन से ही स्‍कूल छोड़ने और लेने जाते रहे थे। अब पिता जी मुझे रोज़ बैंक भी छोड़ने जाते थे। पिता जी की आयु बढ़ रही थी। मुझे प्रतिदिन बैंक छोड़ने के दायित्‍व के कारण वह कभी दिल्‍ली से बाहर नहीं जा पाते थे। मेरे भइया दिल्‍ली से बाहर थे। मैं अपने को बहुत विवश और असहाय महसूस करने लगी थी क्‍योंकि आज भी मुझे बहुत से छोटे छोटे कामों के लिए दूसरों पर निर्भर रहती थी।
एक दिन मैंने एक लड़के को एक स्‍कूटर चलाते देखा जिस के साइड में दो पहिए लगे थे। मैंने उसे रोका और उस स्‍कूटर के बारे में पूर्ण जानकारी प्राप्‍त की और  एक ख्‍वाब मेरे जहन में जन्‍म ले चुका था। अब इस के सफर के लिए मैं हर पल सोचती रहती थी। फिर क्‍या मैंने पिेता जी को अपने लिए यह विशेष स्‍कूटर जिसके साइड में अलग दो पहिए लगे होते हैं और जिसको स्‍टार्ट करने के लिए किक नहीं मारनी पड़ती, खरीदने को कहा। पिता जी एक दम परेशान से लगे और पिता जी को परेशान करने के लिए मैंने यह नहीं कहा था। स्‍कूटर की बात से पिता जी परेशान हो चुके थे यह पूर्णता मुझे तब समझ में आया, जब  वह नाराज होकर डांटते हुए बोले “तुझे क्‍या प्रॉब्‍लम है अगर मैं तुझे बैंक छोड़ कर आता हूँ। कैसे चला पाएगी तू स्‍कूटर? देखा नहीं सड़कों पर कैसा टैफिक रहता है?एक्‍सीडेंट हो गया तो...........कहीं? तो हमारी जिंदगी तो बर्बाद हो जाएगी।” मैं अपने प्रति अटूट अनुराग एवं अति सुरक्षा की भावना को समझ रही थी। वित्तीय रूप से स्‍वावलंबी होने के पश्‍चात भी मैं उनकी मजीं के खिलाफ स्‍कूटर ख़रीद कर उनकी भावनाओं को आहत नहीं करना चाहती थी। मैं एक नये सफर पर थी कि कैसे अपनी मंजिल तक पहँचु । कुछ दिन बाद मैंने अपने एक मित्र के सहयोग से वह विशेष स्‍कूटर चलाना सीख लिया। जिस दिन स्‍कूटर चलाते वक्‍़त एक साइकिल वाला मुझ से पीछे रह गया, वह पल मेरे जीवन का अमूल्‍य और सर्वाधिक रोमांचित कर देने वाला पल था। मेरे जीवन में आशा की किरण और उमंग हिलौरे लेने लगी। देखिये ना, मैं अपनी सोसाइटी के गेट तक नहीं जा सकती हूँ और आज पूरी सड़क पर चल रही थी।
स्‍कूटर  की प्रैक्टिस के साथ यदा कदा मैं अपने उन सभी मित्रों को अपने घर चाय पर आमंत्रित करती रहती जिनकी शारीरिक समस्‍या मुझसे ज्‍यादा थी और ये सभी वही विशेष स्‍कूटर चलाते थे।
मैं ख्‍वाब को पूर देखना चाहती थी पर पिता जी की मुस्‍कान और आर्शीवाद के साथ। एक दिन मैंने विशेष रूप से अपनी सहेली रमा को बुलाया। रमा के दोनों पांव मुझसे भी ज्‍यादा पोलियो ग्रस्‍त थे। रमा हमारे घर आई  तो उसके पति बच्‍ची को गोद में लिए स्‍कूटर पर पीछे बैठे थे और रमा स्‍कूटर चला रही थी उसने हैट पहना था और टॉम ब्‍वाय के जैसे लग रही थी। रमा के जाने के पश्‍चात् मेरे पिता जी बोले, बेटा तुम कल ही स्‍कूटर ख़रीद लो। लो। ये मेरे ख्‍वाबों को पंख लग गए। मैं बैंक स्‍कूटर जाने लगी। हर गली बाजार यहां तक चांदनी चौक अपनी आफिस को सहेली को पीछे बिठा कर ले गई। अपने भतीजा भतीजे भांजा भांजी को बाजार ले जाती । जरूरत पड़ने पर घर से बाजार के काम करने लगी। एक धारा, नदी में बदल गई।  आज मैं कार चलती हूँ।
पिता जी अक्‍सर अब कहते हैं कि काश मैंने तुझे स्‍कूटर पहले ले दिया होता ।
पिता जी को पहली बार स्‍कूटर खरीदने को कहने और रमा के घर आने तक पांच वर्ष का समय लगा था।
सीमा स्‍मृति






Monday, January 13, 2014

लाटरी

वो सर्दी की सुबह थी। मैं रूटीन की तरह बैंक के लिए निकली थी। ये रूटीन भी क्‍या कमाल की चीज है। कभी कभी तो लगता है कि लोगों की मुस्‍कराहट, हँसी सभी कुछ रूटीन सा हो गया है। इसी रूटीन का हिस्‍सा है हर रेड लाइट पर मिलने वाले चेहरे गाडियां और यहां तक की भिखारी।
आज शनिवार था। पहली ही रेड लाइट पर वो छोटे-छोटे बच्‍चे अपनी तेल का बल्‍टी नुमा बर्तन लिए घूम रहे थे। लिजिए हो गई रेड लाइट। बजाने लगे कार के शीशे । एक भिखारी तो बहुत इंट्रेस्टिंग था। पहले वो हमेशा धीरे धीरे कार का शीश बजाता है। जैसे कि कोई साज बजा रहा हो। यदि भीख मिल गई तो खुशी चेहरे और आखिरी बार बजाये गये शीशे से व्‍यक्‍त हो जाती है। यदि भीख नहीं मिली तो चौथी बार बजाये गए शीशे से उसे भीख न दिये जाने पर गुस्‍से  से भरी आवाज आती है।
 मैंने कार के साइड वाले शीशे से देखा कि वो छोटा वाला बच्‍चा पीछे से भागता हुआ आ रहा है। उसे भागता देख बाकी दोनों बच्‍चे भी उसके साथ भागने लगे। मेरे मन की उत्‍सुकता बड़ी गई कि आखिर बात क्‍या है। मैं नजरे उन्‍हीं पर रखी हुई थी।  सड़क के दूसरी ओर एक आदमी खड़ा था । तभी उस छोटे से लड़के ने वो दस का नोट उसे पकड़ा दिया । अभी भी उस छोटे से बच्‍चे के चेहरे की चमक मेरी आंखों में बसी है, यूं की उसकी लाटरी लग गई हो। वो मुस्‍कराहट कमाल थी । काश उसे कैमरे में भी कैद कर पाती ।

हर चेहरा एक लाटरी चाहता है । 
14.01.2014

Wednesday, October 9, 2013

“ प्रश्‍न”

जब कभी हिजडों को रेड लाइटो पर भीख मांगते देखती हूँ तो मन द्रवित सा हो जाता है। इन का क्‍या कसूर है ? कहीं कोई स्‍वीकृति नहीं ।  ईश्‍वर की लीला के आगे किसी की नहीं चलती है।मैं अपने साइड अटैचमेंट वाले  स्‍कूटर को रेड लाइट पर  आफ कर सोचती रहती थी ।  अपने पर्स की बाहर वाली जेब में पैसे रखती थी और सोचती यदि कोई  हिजडा मांगने आएगा तो ग्रीन लाइट होने से पहले पैसे  जल्‍दी से दे दूँगी । आश्‍चर्य  मुझ से भीख मांगने कोई हिजडा  नहीं आता था । मेरे पास से निकल जाते पर कभी मांगते नहीं । पता नहीं क्‍यों ??क्‍या मैं महिला हूँ ?  यह प्रश्‍न मुझे परेशान करता रहता था । ये बात ओर है कि एक दो बार मेरे पास से निकलने वाले हिजडे को मैंने इशारे से बुला पैसे दिये थे।
अभी हाल ही मे मुझे प्रोमोशन मिली और मैं मैनेजर बन गई । सर्वप्रथम मैंने आटोमैटिक कार खरीदी । हमेशा की तरह आफिस के रास्‍ते पर आने वाली  रेड लाइट पर मुझे वही हिजडा दिखाई दिया जो प्राय: इस जगह भीख मांगता था । आश्‍चर्य आज वो मेरी कार का शीशा खटखटा रहा था। मैंने तुरन्‍त उसे दस का नोट थमा दिया ।

आज भी मेरे जहन मे यह प्रश्‍न नश्‍तर सा चुभ रहा है, क्‍या कारण था कि वो मुझे  स्‍कूटर पर देख भीख नहीं मांगता था?  महिला होना कारण  नहीं हो सकता है।  आज कार भी तो मैं चला रही थी । क्‍या मेरा साइड अटैचमेंट वाला स्‍कूटर जो प्राय: लोगों को विकलांगता का प्रमाणपत्र लगता था। क्‍या वो हिजडा मेरी विकलांगता के प्रति द्रवित था ? कौन किस पर दया कर रहा था ? शरीर की दिखाने वाली विकंलागता उसके दर्द से बड़ी थी ? प्रश्‍नों का एक सहलाब आज भी मेरे जहन में उमड़ धुमड़ रहा है। क्‍यों आखिर क्‍यों????????????


सीमा ‘स्‍मृति’