Friday, November 8, 2013

‘ इजाजत’

  उन बेबस खामोश निगाहों में
  उतर आया था शून्‍य
  सिमट गया था हर एहसास
  बिखर कर रह गई थी जिन्‍दगी
  बस इक ‘ इजाजत’ की गूँज में । 

बीता वक्‍त

जब भी तेरी तस्‍वीर,तस्‍वुर में आती है
जिन्‍दगी पे एतबार की हर कड़ी बिखर जाती है। 

Thursday, November 7, 2013

‘मूक’

स्‍पर्श केवल,
अंघकार की जबान नहीं,
यह भाषा है,
प्रत्‍येक जीवन की
भट्टी के अंगारो की तरह उकेरा है
हर स्‍पर्श से पूर्व ‘जिन्‍दगी’ ने ।

याद

याद कोई बादल नहीं,
जो आये और चली जाये
ये तो वो
थिर सूरज है
जो चमकता है
 क्षण प्रति क्षण 

प्रश्‍न

जो ‘अर्थ’ जिन्‍दगी को
हम देना चाहते हैं
अर्थ स्‍वंय जो पाती है जिन्‍दगी
इसी कशमकश में
अक्‍सर निकल जाती है जिन्‍दगी ।

Wednesday, November 6, 2013

तेरी याद

तेरे कहने से, मैंनें  दिया
इक रूप अपने एहसासों को
बांध कर तेरी याद मुट्ठी में
उड़ा रही हूँ, तेरी दी खुशबु ।

कपड़े

ऐस्‍सी कार के रंगीन शीशों से
झांकती दो आंखे,
फेर लेती हैं मुहँ
चिलचिलाती धूप में,
देख अर्धनग्‍न लड़की को मांगते भीख ।
छी वट कंट्री ? ?  कैसे मांगते है ?
कम से कम कपड़े पहनकर तो मांगे ।

ड्राइवर जल्‍दी चलो
होटल पहुंचने में देर हो रही है
वो फ्रांस की पार्टी निकल जाएगी…….
ये टेंडर भी हाथ से निकल गया तो
कैसे लगा पाएंगे............

हम एक्‍सपोर्ट गारमेंट की फैक्‍टरी ।