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Monday, February 13, 2017

1
तलाशती रही ज़िन्दगी-साथ
उनके भी साथ ,जो 
चलते रहे साथ साथ।

2
ख़ामोशी को अक्सर
राह का पत्थर समझ
ठोकरे मिलती हैं
चशनी में डूबे शब्द
जो छलनी भी करें
दर्द रोमान्स लगता है।
बात स्व:प्रकृति की है
किसको क्या अच्छा लगता है|

3
बाँसुरी सी तेरी याद
आज भी मन की तहो में
देती सुर 
सुबह नये गीत सी 
और 
शाम गज़ल सी बन जाती ।


4
कुदरत लिखती रही
हर दिन
जिन्दगी की किताब के पन्नें
हम किताबों में खोजते रहे ज़िन्दगी।
5
सागर से पूछा
कैसे हज़ारो राज
अपने तहों में छिपाये रहते हो
सागर मुस्कराया और बोला
मैं इंसान नहीं
जो अनभिज्ञ रहे
अपने ही मन की थाह से।
6
ये जिन्दगी
ठीक उसी सहेली सी है
जो प्यार तो बहुत करती है
पर मन की किसी तह में
जलन सम्भाले रखती है।

सीमा स्मृति

Saturday, April 9, 2016

क्षणिका

कुछ ऐसी,
तेरी आदत हो गई मुझे
ये कैसी इबादत
जो खुद से जुदा कर रही मुझे।

दिल की सरहद पे
लड़ती हूँ जंग,खुद से
हारती रहूँ खुद से
करती दुआ रब से।

ज़िंदगी का ये मोड़, कबूल मुझे
सफ़र होगा कितना लम्बा
अब नहीं फिक्र मुझे
हर लम्हें में मिल रहा सकून मुझे।

सीमा स्मृति

1 
तुम करते हो मेरे लिए हूँ
जो तुम कर सकते हो
हमें तो तेरे संग अपना भी इल्म नहीं...............
2

हम नासमझ नहीं
फिर क्यों?सुन तेरे शब्द
समझ का हर तार सुन्न सा हो जाता है..........
3
हम नहीं तेरे
हमसफ़र,ये नहीं थी  तक़दीर
ये और बात है.........
ना कर सकें बात, तेरे सफ़र मे
ये दिल को  अब मंजूर नहीं।
4
साँझ का इंतजाार करती हूँ
तू हो सफ़र मे ये दुआ करती हूँ
हमसफ़र-दरिया के किनारों से होते हैं
ये एतबार  रखती हूँ।
 इक बूँद नीर की तलाश
दे रही......
दरिया नीर का....
दोस्तों ना रहो अंजान
आने को है तूफान।

सीमा स्मृति

 हथियार से ज़्यादा
छीन रही ज़िन्दगी
जीवन की रफ़्तार
रहो होशियार.........


सीमा स्मृति

Monday, March 21, 2016

1
बौद्धिकता के ठेकेदार
क्या जाने
आम आदमी की ठोकरे
देते हैँ नारे
जलाते वक़्त की धारणनाये
खुद को लगाते पँख
मिल सके उन्हें,उड़ान
दे उन्हें पहचान
नये ठेकेदार होने की........
बेख़बर सभी
आदमी होने के लिये
पँख नहीं
जमीं की पकड़ जरूरी है।

सीमा स्मृति
2
लगने लगे सीले-सीले
जो जिन्दगी के सिलसिले
जान ले सख़ी
खुद ही से खुद के सम्बन्ध
कहीं हो गये हैं
कड़वे -कटीले।

सीमा स्मृति 

3
हमदर्द की तलाश
होती है ख़ास
खोजते हैं सभी दिन रात
हो बेख़बर-
हमदर्द में भी है दर्द
बस ये दर्द है तेरे साथ
इस को बना ख़ास
यही देगा साथ
नये अहसास
नया विश्वास
नई आस
पूर्ण होगी तेरी तलाश।

सीमा स्मृति

4
कहते हैं लोग
हमें जिन्दगी में क्या मिला?
रख पलड़े में, दूजी जिन्दगी
ग्रंथो  में खोजा
नाम ध्यान में खोजा
साधना में खोजा
प्रकृति में खोजा
उत्तर न मिला क्या है जिन्दगी
प्रश्नो के उत्तर में नहीं
इसी पल में है- जिन्दगी।

सीमा स्मृति


5
कमबख्त नींद भी, आज सहेली सी रूठी है
पलकों से भी नाता तोड़े बैठी है।

सीमा स्मृति
6
ख़ामोशी में जो न हो दर्द और शिकायत की टीस
ऐसा कहाँ अपना नसीब??
सीमा स्मृति

7
जब से खुद पर फ़िदा होना सीख लिया
होंठ नहीं आँखे भी मुस्कुराने लगी हैं।



8
जो देखी अपनी ही तस्वीर
यूँ लगा
अब भी कोई सपना आँखे
सम्भाले बैठी हैं।

9

होठों से निकले बोल
चाशनी से,सत्य की तहे दबा देते हैं
दिल  से निकले बोल, बरखा से
सत्य की मीठास किया करते हैं।

सीमा स्मृति

10

रिश्तों की उलझनें
बॉलटिंग पेपर सी
सोख लेती है
एक ही पल में जिन्दगी की मीठास ।

सीमा स्मृति

11

मत किया करो
वक़्त से कोई सवाल
उत्तर के इंतज़ार में
अक्सर जिन्दगी की लय बिगाड़ देता है।

सीमा स्मृति

12

अंतराष्ट्रीय महिला दिवस

आज
बलत्कार कर
जलाई गई
बेइज्जत की गई
घर से निकाली गई
अजन्मी मिटाई गई
पिट पिट मारी गई
कल अंतराष्ट्रीय महिला दिवस मनाने की सुर्ख़ियो मे दबी
कल की ख़बर आज दिखाई गई।
सीमा स्मृति



13
बनावट की  तहें इतनी मोटी हो गई कि
अहसास की खुरपी, 
खुन्दी हो
टूटने की कगार पर है।




Wednesday, January 6, 2016

अपनी गंध

आज फिर
बटोरे मैंने, अपनी तन्हाई के टुकड़े
जोड़े, 
दिया इक रूप
दी धूप अपने होने की
सर्दी में बॉलकनी में पड़े लिहाफ़ सी
 गंध कुछ कम सी हुई 
बस जाती है जो ज़िन्दगी में
भीड़ में जीते जीते-तन्हा इन टुकड़ों में।

सीमा स्‍मृति

खुशबू 
चंद सूखे  फूलों सी
रिश्तों की महक
आज भी मेरी जीवन किताब को, रही हैं महका
जिन्हें मैंने सहेज लिया था
इस डर से
खुशबू कहीं कर दे न रुसवा।

सीमा स्मृति

सवाल


जिन्दगी में कुछ रिश्ते देते हैं
मुस्कान!
पहचान!
विश्वाश!
आत्मविश्वास!
नये अहसास!
तुजरबा!

और कुछ देते हैं-
हीनता!
थकान!
करते हैरान-परेशान
छिन लेते चैन!
करते बेचैन!
छींन लेते मुस्कान!

जिन्दगी ने  किया सवाल
क्या दिया तुमने
बस रखो -यही ख्याल ।

बूझो


कौन है -वो
शांत
बर्फ गिरने के बाद घाटी -सी
मासूम
सर्दी की भोर -सी
चंचल
पहली बरसात के बाद नदी-सी
ख़ामोश
झील की तह-सी
मीठी
झरने की पहली-धारा सी
दुखी
फटी धरती की दरारों- सी
परेशान
छाँव को  तरसते-भटकते राहगीर-सी
हाँ
वो जिन्दगी ही है
आईने सी खुद पे मुस्करा रही।
सीमा स्मृति

Tuesday, November 24, 2015

भटकन

भटकन की रेत पे
जलते हैं पाँव
कितनी भी तलाशो
मिलती नहीं छाँंव ।
बिना पानी का ये दलदल
छीन लेता है चैन हर पल । 

जिन्‍दगी  भूल जाती है
गाना, गुनगुनाना
मुस्‍कराना
अपनी ही ताल पे थिरन जाना
किस्‍मत की दुहाई से
बढ़ी भटकन
कर्म की मशाल से
छटी है भटकन।

सीमा स्‍मृति

Friday, October 30, 2015

क्षणिका

1
एक सत्‍य
बेल से लिपटे सर्प-सा
मन की देहरी –पे
सरसराने लगा
लम्‍बी खामोशी
गूंजती रही फुंकार
कुछ सर्प-
बिल नहीं खोजा करते।

2
स्‍मृतियों के बीच
दुबका मन
कब तक जियेगा
दूब के अन्‍दर
पल रहे पेड़ होने का भ्रम ।

3
खामोश हो गई, हवा
इस डर से
आदतें भी अजीब हुआ करती हैं
साँस लेने को
जि़न्‍दगी समझने की आदत।
4
जीया दर्द
खोजती रही खिड‍़कियाँ
क्‍यों रही अनजान
दरवाजे की अहमियत से।
5
वो तूफान था
हवा समझ
जीया जो भ्रम
पल भर
झोंका वो
नयनों में नमी
ताउम्र की दे गया।


6
मिलती है हँसी
शर्तो पे
मुस्‍कान के लिए
इक आइना ही काफी है ।

सीमा स्‍मृति


Sunday, October 11, 2015

दिशा

 कुछ  पाने की जिद्द
बदल देती है 
आचार! व्‍यवहार! और संस्‍कार 
करती है बेचैन 
छीन लेती है चैन
और
जुनून कुछ कर गुजरने का
देता सूकून 
दिशा! भक्ति! शक्ति!
देता अर्थ
रोकता अनर्थ
ये झीनी सी परत 
जिदृ और जुनून में 
जीवन  दिशा है बदल देती । 

सीमा स्‍मृति




विविध

     1
वक्‍त की धार
बन कटार
शब्‍दों के टुकड़े करती रही
स्‍याही क्‍या लिखेगी 
हाइकु कहानी कविता
एहसास के पन्‍नों पे
हर स्‍याही रंग बदलती रही ।

2
परत दर परत 
दीवार पे पेन्‍ट चढ़े से -ये रिश्‍ते
बदले मौसम में
झर जाते हैं 
पपड़ी  बन -बन। 

3
अंदर का मैं -----शब्‍द जाल बना सिर्फ
मिमियता है
लोग इसे जीवन कहते हैं।  

4
अभी कुछ कर्ज बाकि होंगे  सॉंंसों के
वरना--
लबों की हँसी 
यूँ टुकड़ों में ना मिलती 

आदत

आदतें भी अजीब हुआ करती  हैं.......
बात करने की आदत
दर्द सुनाने
शिकायत करने
तारिफ सुनने
खुद को साबित करने
इनकार  इकरार प्‍यार करने
मुस्‍कराने 
कुछ कर गुजरने
बोलने
सुनने
खामोश रहने की आदत
फि़कर और जिकर
खुश और दुखी रहने  की आदत
सांसों के चलने तक
रंग बदलती 
दोस्‍तों -आदतें भी अजीब हुआ करती हैं।

सीमा स्‍मृति

जिन्‍दगी

अपनी ही सोच का प्रवाह है- जिन्‍दगी
इस  क्षण नाम है -जिन्‍दगी
कुदरत का करिश्‍मा है - जिन्‍दगी
सांसो की लय है - जिन्‍दगी 
शब्‍दों में कब बंधी है- जिन्‍दगी
ऐ दोस्‍त 
वक्‍त की सलीब पे हैरान है- जिन्‍दगी ।
सीमा स्‍मृति

Saturday, September 12, 2015

क्षणिकाएँ

खोज  दीवानी
आँखों
साँसों
रिश्‍ते-नातों
जिन्‍दगी की बातों में
इंसानों
मकानों
दुनिया की दुकानों में
 खोज रही
कौन सी छवि
सीमा स्‍मृति

Thursday, January 22, 2015

साथ

यूँ तो अपनी परछाई भी
छोड़ देती है साथ, बिना रोशनी के
कौन रहता है, हर लम्‍हा किसी के साथ,
खोजती मैं, जिन्‍दगी हर लम्‍हें के साथ,
रहते हम साथ नहीं
साथ उम्र भर का नहीं,
वादा भी कोई किया नहीं
बस-जीना चाहती हूँ
छोटा-सा साथ
दे पूर्णता का एहसास ।


सीमा स्‍मृति 

साथ

‘साथ’ वादों से नहीं
इरादों से बना करते हैं
इरादे विश्‍वास में झलका करते हैं
दोस्‍तों  
विश्‍वास किया नहीं जाता
दिया जाता है।

सीमा स्‍मृति 

Monday, January 5, 2015

जीवन

देखे हैं तेरी खुशी में,
तितलियों के पंखों से रंग ।
सुनी है मैंने तेरी खुशी में,
भँवरों की गुनगुन
मैं जानने लगी हूँ
अस्तित्‍व के धरातल पर
तू संधर्ष की लहरों से
टकराता प्रतिपल
मुस्‍कराता और कहता
दोस्‍त-
यही जीवन
यही जीवन।


सीमा स्‍मृति



Sunday, December 28, 2014

एहसास

ये एहसास
बेकाबू  नदी ना हों
खामोशी का बांध जरूरी है
चाहत है कितनी गहरी
नि:शब्‍द एहसास जरूर है । 
आसान है  कहना
पर 
बन्‍धन में ख़ामोशी भी जरूरी है।  
                                 सीमा स्‍मृति

पल

मांगे जो दो पल
सिर्फ अपने लिये
हज़ारों बहाने अफ़साने मिले
अपनों के भेष में पराये मिले। 

                 सीमा स्‍मृति

अनिश्चित

कैसे बनेगें हम किसी के जीने का मकसद दोस्‍त
निश्चित है मकसद की डोर 
तेरी मेरी सोच से भी कहीं आगे।
                                        सीमा स्‍मृति