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Wednesday, January 6, 2016

परिवर्तन



आज सुबह
रास्ता बदल कर देखा
कुछ नये मोड़ लिए
हाँ!
कुछ भूल हुईं
कुछ दर्द मिले
कुछ भटकन मिली
कुछ नये संघर्ष

कुछ नये आकर्षण
एक नयी पहचान
कुछ खोया
कुछ पाया
कुछ नये अहसास
रास्ते और आदतें
प्रायः सी लगी
हाँ
बदले रास्ते और आदतें
जीवन खुशगवार कर दिया करती हैं।
सीमा स्मृति



सीमा स्मृति

Monday, January 26, 2015

“खोज”


मिश्री से मीठे,
निबोरी से कड़वे,
कैक्‍टस से कटीले,
फाहे से सोखते दर्द,
रेत से सरकते,
दलदल से खींचते,
दिन से उजले,
अमावस्‍या की रात से घनेरे,
गोंद से लिजलिजे,
हवा से हल्‍के,
एहसास से बहते,
खुली चोट से विभत्‍स,
हैवानियत से क्रूर,
प्रकृति से मोहक,
आसमान से विस्‍तृत,
धरा से रहस्‍यमय,
सागर से गहरे,
वक्‍त से अनिश्चित,
फूलों से कोमल
मानवीय रिश्‍तों के ये अनूठे रंग-रूप
बिखरे जीवन के अदभुत कैन्‍वस पर
करते कभी हैरान कभी परेशान
कभी करते जीवन को आसान
कभी करें बेचैन
कभी छीन लेते चैन
रिश्‍ते
प्रश्‍नों की सलीब---खोजते अर्थ।

सीमा स्‍मृति 

फीकी मुस्‍कान


फीकी –सी धूप
ठीक, उस फीकी सी मुस्‍कान सी
जो सिमट जाती है माँ के चेहरे पर
करती बेस्‍ट ऑफ लक
जवान बेटे को,हर रोज नया इन्‍टरव्‍यूह
देने जाते वक्‍त ।
वो फीकी मुस्‍कान---
शादी के इश्तिहारों में खोजती
बेटी का भविष्‍य ।
वो फीकी मुस्‍कान---
रिटायर पति को देती दिलासा
देख बैंक पास बुक का बैलेंस ।
जिन्‍दगी जीने की
नसीहतें!उपाय,!आइडिया!
टेलीविजन के चैनलों पर देख
सिमट जाती है “वही फीकी मुस्‍कान”
काश जिन्‍दगी होती इतनी ही आसान ।


सीमा स्‍मृति 

Tuesday, December 30, 2014

नव-वर्ष


नव-वर्ष  की  शुभकामनाओं  के लिए
एहसास की सुगन्‍ध चाहिए
यूं तो  नि:शब्‍द भी----
जीवन की बगिया महकती है,
उम्‍मीदों  के पंछी चहकते हैं,
संभावनाओं की तितलियां मचलती हैं,
आस के भँवरे गुनगुनाते हैं,
और
कहते हैं, बार-बार
भूलो इसी क्षण
जो कल बीते,कठिन पल
देखो नई दिशा,
फैलाओ नव उल्‍लास,
करो नव प्रयास,
मिले नई आशा,
जीवन को दो नई परिभाषा।
नव-वर्ष की नव किरण देती पैगाम
शुभ हों ! पूर्ण हों! फलीभूत हों !
तुम्‍हारे सभी काम ।

सीमा स्‍मृति


Thursday, December 25, 2014

पहचान

देख ये है हैवानियत
कुदरत  भी  है हैरान
क्‍या मैंने ही बनाया था इंसान
अपनी ही नस्‍लों को करता बर्बाद
किस मुहँ  से खुद को कहता इंसान
चिथड़े उड़ाता अपने ही जिगर के टुकड़ों
और
कहे ये है मुझसे मिलने का है रास्‍ता
अरे ओ शैतान
खुद को पहचान
ना कह खुद को इंसान
वो लाल भी जन्‍मा था तेरी मां सी कोख से
जो उजाड़ी तूने ले, मेरा नाम ।
कौन सा रास्‍ता कैसे रास्‍ता मेरे नाम
अरे इंसान बस अपने अन्‍दर झांक ।

सीमा स्‍मृति

Sunday, July 13, 2014

शब्‍द

मैं खोजती शब्‍द.........
घर के हर कोने में
दरवाजों के पीछे
बंद संदूकों में
आंगन में, चौबारे पर
परछती पर
पलंग के नीचे
अलमारी के पीछे
रोज यहीं तो छिपा करते थे
कहां गए शब्‍द.......
बंद आंखों से भी
खोज लिया करती थी मैं शब्‍द
खामोशी में भी चुन लिया करती थी
आज खोजती शब्‍द.........
वक्‍त खटखटाता रहा दरवाजा
मैं खोजती रही शब्‍द
तुम्‍हें मिले तो बताना
वो शब्‍द जो जोड़ते खुद को खुद ही से
वो शब्‍द जो सुनने को आतुर रहें हम सब
वो शब्‍द जो जोड़ते मन के तार
जिन्‍हें सुन बजे सितार
वो शब्‍द जिन में बनावट नहीं
वो शब्‍द जो देते मरहम
वो शब्‍द जो खामोश कहते समझते दिल की बात
हां वही सभी शब्‍द
मिले तो बताना ।
सीमा स्‍मृति

Friday, April 4, 2014

बचा लो


कैसा लगा दीमक
आज समाज में
गलने लगा, सड़ने लगा
हर रिश्‍ता!  संबंध !एहसास
गुरू-शिष्‍य
पति-पत्‍नी
बाप-बेटी
भाई-भाई
भाई-बहन
जनता-नेता
चीखते पुकारते
करते हैं सवाल
कहां से आया दीमक
खोजो इलाज
वरना बिखर जाएगा
टूट जाएगा
मिट जाएगा---- समाज
क्‍या देगें हम अपनी नस्‍लों को
क्‍या सिर्फ दुर्गन्‍ध
रूक जाओ ----
ठहर जाओ ----
थम जाओ -----
खोजो इलाज----
बचा लो
ये टूटता-बिखरता समाज
बचा लो - बचा लो
खुद ही को इस दीमक से।
सीमा स्‍मृति

चित्र गुगल प्रभार 

Friday, January 31, 2014

स्‍त्री : एक परिभाषा


कोख में मरना,
जरूरी नहीं है पढ़ना,
घर के सभी काम करना,
प्‍यार से घबराना,
हर कदम डर जाना,
रोना, पर सिसकियाँ ना भरना।

दहेज की आग में जलायी जाओ,
सामूहिक बलत्‍कार में मारी जाओ,
एसिड से नहलाई जाओ,
हर यातना सहना,
आह कभी ना भरना,
स्‍त्री तेरी एक परिभाषा
तिल तिल कर मरना
और

एक पुरूष को जन्‍म देना।

Tuesday, January 28, 2014

प्रेम और प्ररेणा


पुराना है विषय
नये हैं संदर्भ
किसी प्ररेणा के गर्भ  में 
ही पलता होगा प्रेम। 

आज हर चौराहे 
मैट्रो,बस,ट्रेन में
प्रेम का इजहार मिलता है।
प्ररेणा भटकती है
दर दर पुकारती
संस्‍कृति पर ये एसिड का हमला
कब तलक चलेगा
कला, संस्‍कृति, कृति को  
कब तक यूँ ही जलना पड़ेगा। 

पश्चिम में खोजते अपनी पहचान
क्‍या पूर्व में अब सूर्य ढलेगा ??
प्रेम और प्ररेणा का
अद्भुत,  गूढ़, गहन रहस्‍य 
ग्रंथो व काव्‍य ग्रंथो में भी 
नहीं मिलेगा । 
सीमा स्‍मृति

Sunday, January 19, 2014

प्रश्‍न

सोचती हुँ कभी कभी
हादसो से भरी इस दुनिया में 
फूलों का खिलना 
सूरज का चमकना
पंछियों का चहचहाना
बच्‍चों का मुस्‍कराना
बदलों का गड़गड़ाना
नदियों का छन-छनाना
ना होती ये सुरलहरियों
तो जिन्‍दगी  कैसी होती?






खामोशी

मुश्किल है समझना
खामोशी, जो
कहीं हथियार 
कहीं अहम् की तलवार
कहीं बेबसी
कहीं प्‍यार
कहीं एतबार
कहीं सफलता
कहीं असफलता
कहीं पुल बन जाती है।
झीनीं है परत इसकी
छूते ही छुई मुई बन जाती है।
काश समझ पाती खामोशी
जो आज भी मुझे प्रतिदिन
दर्द की नयी टीस दे जाती है।
सीमा स्‍मृति

16.01.2014

Sunday, January 5, 2014

कल्‍पना या यथार्थ


उडेल सको अपनी थ‍कान,मुस्कान
 
चिढ़ और गुस्‍सा
 
चिल्‍लाया जा सके
 
झल्‍लाया जा सके
 शब्‍द बोझ न हो
 
जहाँ सोच पर बंधन न हो
 
दर्द को दर्द की ही तरह बाँटा जा सके
 
खुशी को जिया जा सके
 
प्रश्‍नों के तीर न हों
 
डर न हो रिश्‍ते की टूटन का
 
भय न हो खो देने का
 
छूट हो कुछ भी कहने की-
मन में जो भी धमक दे 
 
जहाँ लम्‍हें शर्तो पर न जिए जाएँ
 
माँगे हो, 
न पूरी होने पर, अनजाना डर न हो
आदर सम्‍मान केवल शब्‍दों की चाशनी में लिपटे न हों,
रिश्‍ता बन सके ,आईना जिन्‍दगी का
पाना चाहता है हर शख़्स यह खूबसूरत रिश्‍ता
दे पाना, यह खूबसूरती
आज भी है, प्रश्‍नों की सलीब पर ।
सहज साहित्‍य पर प्रकाशित मेरी कविता



Thursday, December 5, 2013

लाइव

नोचे गए रिश्‍तों
भाई –भाई
बहन- भाई
गुरू- शिष्‍य
जनता –नेता
पत्रकार-पत्रकारिता
पति-पत्‍नी
हर सामाजिक रिश्‍ते की लगती है,नुमाइश
रोज रात नौ बजे
बैडरूम, ड्राइंग रूम,दुकानों और चौराहों पर
लटके टी.वी के हर चैनल पर
बहस के दौर चलते हैं-----लाइव
ना  जाने  कहां  गई  लाइफ
कार्यक्रम की रेटिंग का सवाल है
कौन सोचे कहां गई लाइफ
कहां गई मेरे दोस्‍त, लाइफ

सीमा स्‍मृति
२७.११.२०१३



Tuesday, November 19, 2013

ये कैसा सच

सब कुछ बदलते देख लिया
रिश्‍ते-नाते  
लोग- व्‍यवाहर
वक्‍त- प्‍यार
रहन-सहन
आचार विचार
शरीर - आयु 
आधार -संस्‍कार
बस नहीं, बदली तो----------
सिर्फ तेरी याद,   सिर्फ तेरी याद।

Wednesday, November 13, 2013

सफर

लिखी जा सकती है
एक लम्‍बी कविता
बन्‍दर और मगरमच्‍छ की कहानी का
कापी राइट लेकर
मीठी, सुन्‍दर गहन----- कविता
मैं तो केवल एहसासों को 
करती रही शब्‍दबद्ध
भ्रम ही सही
लगा क्‍या ये कविता है
खोजती अस्तित्‍व 
संघर्षरत जिन्‍दगी
जीती लम्‍हें 
पिरोती शब्‍द
ये भी नहीं जानती ..... क्‍या है कविता
अपने ही पिरोये शब्‍द 
अंकित कर 
जीने लगी जिन्‍दगी 
लगा रास्‍ता आसान ना सही
मंजिल भी नहीं 
फिर भी जीया जा स‍कता है अकेले
चलने लगी 
पिरोती एहसास अपने साथ ।





Wednesday, November 6, 2013

कपड़े

ऐस्‍सी कार के रंगीन शीशों से
झांकती दो आंखे,
फेर लेती हैं मुहँ
चिलचिलाती धूप में,
देख अर्धनग्‍न लड़की को मांगते भीख ।
छी वट कंट्री ? ?  कैसे मांगते है ?
कम से कम कपड़े पहनकर तो मांगे ।

ड्राइवर जल्‍दी चलो
होटल पहुंचने में देर हो रही है
वो फ्रांस की पार्टी निकल जाएगी…….
ये टेंडर भी हाथ से निकल गया तो
कैसे लगा पाएंगे............

हम एक्‍सपोर्ट गारमेंट की फैक्‍टरी ।

Wednesday, October 30, 2013

ओस सा अस्तित्‍व

ओस की बूंद-सा अस्तित्‍व
सूर्य किरण में सिमटता
चन्‍द्र किरण से खिलता
ये अस्तित्‍व के धरातल पर
ओस-सा अस्तित्‍व
      चाहा बहुत
ना सूर्य का अपनतत्‍व मिला
ना ही चन्‍द्र से जुड़ा कोई नाता
ओस का संधर्ष है निरन्‍तर
पर क्षणिक है जीवन से नाता।

Monday, October 28, 2013

निज अस्तित्‍व


परिस्थितियों की कठपुतली आवाज देती है
जब कभी  निज अस्तित्‍व की
केवल प्रतिघ्‍वनित होकर रह जाती है वो
चारो ओर फैले अहम् के गुबार में
ये जानते हुए  निश्चित है रह शक्‍स की जीवनधारा,
किसी अनिश्चित्‍ता की डोर से
नहीं टूट पाता एक चक्रव्‍यूह
धिर जाती है धारा इक नये व्‍यूह में
कहां मिलेगा अस्तित्‍व का धरातल
अन्‍जान है इससे फिर भी
डाल वो कवच संघर्षो का 
उतर पडती है अनुभूति की गहराई में 
यथार्थ की तपन में झुलसने लगा कवच 
धुटकर कर रह जाती है वो आवाज 
उस गुबार में 
जिसमें धिरा  उलझा  जूझता 

हर व्‍यक्तित्‍व तलाशता है निज अस्तित्‍व।

Saturday, October 26, 2013

पैबंद

कब तलग जोड़ते, 
सहेजते रहोगे
वो पैबंद, जो लगाये थे तुमनें
मेरी जिन्‍दगी में प्‍यार के नाम पर ।
तुम जीते रहे जिन्‍दगी,
कैद मैं चंद दीवारों में
अतीत के साये में
रूप पैबंद को देती रही तुम्‍हारे अनुरूप ।

तुमने सम्‍बन्‍धों के एहसास
जीए जिन्‍दगी के नाम पर
तुम मेरे हो, इस एहसास में
स्‍वंय से क्‍या है, 
मेरा सम्‍बन्‍ध जी ना सकी मैं
बात सिर्फ एक दशक की नहीं
लम्‍हा लम्‍हा जोड़ते पैबंद का दर्द
जीया है मैंने प्‍यार के नाम पर ।

Thursday, October 24, 2013

रेखा

जिन्‍दगी की किताब के
पृष्‍ठ बदलते रहे
उन पर अंकित
गहरी काली रेखाएँ
कुछ अमिट
तनिक सिमट कहती रही
कहानी जिन्‍दगी की।
सुना तो था
या
किया अनसुना याद नहीं
हाँ
एक एहसास कहानी पूरी होने का
रेखाओं में सिमट
छूने लगा संवेदना के तार
गहराने लगी रेखाऍं
किस्‍मत की स्‍याही से
पृष्‍ठ भरने को थे
तभी
रेखाएँ भ्रम दे कालिमा का
कहने लगी
अधूरे कोरे पृष्‍ठों के सहारे भी
किताबे पूरी हुआ करती है 
‘रेखाओं’ के अंकित होने तक ।