Sunday, July 13, 2014

शब्‍द

मैं खोजती शब्‍द.........
घर के हर कोने में
दरवाजों के पीछे
बंद संदूकों में
आंगन में, चौबारे पर
परछती पर
पलंग के नीचे
अलमारी के पीछे
रोज यहीं तो छिपा करते थे
कहां गए शब्‍द.......
बंद आंखों से भी
खोज लिया करती थी मैं शब्‍द
खामोशी में भी चुन लिया करती थी
आज खोजती शब्‍द.........
वक्‍त खटखटाता रहा दरवाजा
मैं खोजती रही शब्‍द
तुम्‍हें मिले तो बताना
वो शब्‍द जो जोड़ते खुद को खुद ही से
वो शब्‍द जो सुनने को आतुर रहें हम सब
वो शब्‍द जो जोड़ते मन के तार
जिन्‍हें सुन बजे सितार
वो शब्‍द जिन में बनावट नहीं
वो शब्‍द जो देते मरहम
वो शब्‍द जो खामोश कहते समझते दिल की बात
हां वही सभी शब्‍द
मिले तो बताना ।
सीमा स्‍मृति

Sunday, June 8, 2014

मुस्‍कान


    1
 हवा से हल्‍की
 बचपन की साथी
 क्‍यों खो जाती।
        2
 कभी कटीली
 लिपटी चश्‍नी संग
 बदले रंग ।
     3
 आंखो से बोले
 राज दिल के खोले
 ये हौले-हौले।
    4
 सभी पढ़ते
 ये बेबस मुस्‍कान
 बन अन्‍जान।
      5
 करे हैरान
कभी ये परेशान
फीकी मुस्‍कान।
   6
पहाड़ी नदी
सी, बहती जाए
मिठू मुस्‍कान।
    7
तहों में करे
कैद, दिल के राज
ये भी अंदाज।
     8
ये जहरीली
करे दिल पे वार
यूं बार-बार।
    9
जूही की कली
महकाती आंगन
भोली मुस्‍कान।
10

कभी ये आये
कभी सिमट जाये
खोजी मुस्‍कान  ।


माटी


   1
कान्‍हा ने खाई
माई सृष्टि दिखाई
लीला रचाई।
    2
माटी से बने
मिलेंगे माटी ही में
क्‍यों हैं अन्‍जान ।
    3
माटी का मोल
जीवन अनमोल
योद्धा के बोल।
   4
ललाट लगी
माटी देश की शान
बढ़ाती मान।
    5
सौंधी ये गंध
करे बावला मन
देती जीवन।
    6
हो ये बावरी
क्‍यों बनी किरकिरी
जीवनदात्री।
    7
हैं खेले खेल
बचपन की साथी
अब ना भाती।
    8
रूप अनेक
ये कारी भूरी लाल
देती दुलार।


 28.05.2014

Wednesday, May 28, 2014

वक्‍त

1

वक़्त के आगे

चले ना चतुराई

समझो भाई।

 2

वक़्त सूरज

दिखाता है ये राह

ना घबराना ।

3

वक़्त के साथी

बदलें प्रतिपल

देखता चल।

4

वक़्त की छड़ी

करती ना आवाज़

गिराती गाज।

 5

समय-सिन्धु

अनंत असीमित

डूबे हैं लाखों।

 6

काल कोयल

मधुर गीत गाता

भाग्‍य -विधाता।

7

खामोश झील

समय का रहस्‍य

बढता जाए।

8

कर आगाज़

बन जा तू आवाज़

वक़्त हो साज।

   9

बन सारथी

ये चलाये जीवन

हो पहचान।

  10

ये सुख दुख

वक़्त के हैं गुलाम


ले तू मान।

Wednesday, April 9, 2014

पतझर

1

हुई खामोशी

पतझर- सी पीली

घूमे अकेली ।

2

ख्‍़वाबों के रंग

क्‍यों हुए बदरंग

बूझो पहेली ।

3

वो ठूँठ बना

करता इंतजार-

आए बहार।

4

वक्‍त सीखता-

रंगों की पहचान

बन सुजान।

5

बदले चाल

पतझर के बाद

आये बहार।

6

बदले रंग

जीवन व मौसम

क्‍यों संग- संग।  

7

टूटे पत्तों- सी

जिन्‍दगी की कड़ियाँ

टूटीं- बिखरी।

8

ये एतबार-

यूँ मिलेगी बहार

हो नया प्‍यार ।

9

वक्‍त- आईना

कभी न घबराना

चलते जाना।

10

अपना साया

इंद्रधनुष बन

बदले रंग।


Friday, April 4, 2014

बचा लो


कैसा लगा दीमक
आज समाज में
गलने लगा, सड़ने लगा
हर रिश्‍ता!  संबंध !एहसास
गुरू-शिष्‍य
पति-पत्‍नी
बाप-बेटी
भाई-भाई
भाई-बहन
जनता-नेता
चीखते पुकारते
करते हैं सवाल
कहां से आया दीमक
खोजो इलाज
वरना बिखर जाएगा
टूट जाएगा
मिट जाएगा---- समाज
क्‍या देगें हम अपनी नस्‍लों को
क्‍या सिर्फ दुर्गन्‍ध
रूक जाओ ----
ठहर जाओ ----
थम जाओ -----
खोजो इलाज----
बचा लो
ये टूटता-बिखरता समाज
बचा लो - बचा लो
खुद ही को इस दीमक से।
सीमा स्‍मृति

चित्र गुगल प्रभार 

Thursday, April 3, 2014

जीवन के रंग

1
 अपने संग
 सहेजती मैं रंग
 तितली बन।
2
 टूटे सपने
 रूठ गए अपने
 बने पराये ।
3
खोजती पंख
छू लेती आसमान
 मेरी उड़ान ।
4
 खोये शब्‍द
ना लिखा गया पूरा
गीत अधूरा।
  5
माँ का सपना
बने घर अपना
जोड़े सामान ।
6
 मैं हूँ खोजती
खो गए सभी मोती
माला पिरोती ।
7
करो स्‍वीकार
सपने हों साकार
ये एतबार।
8        
खिले गुलाब 
न। हों संग ये काँटे
दर्द मिटा दे।
9
मेरी तन्‍हाई
कभी लेगी बिदाई
रात,ना आई।
10
ये सुख -भ्रांति
दुख देता अशांति
खोजते शांति ।