Saturday, December 27, 2014
Friday, December 26, 2014
Thursday, December 25, 2014
पहचान
देख ये है हैवानियत
कुदरत भी है हैरान
क्या मैंने ही बनाया था इंसान
अपनी ही नस्लों को करता बर्बाद
किस मुहँ से खुद को कहता इंसान
चिथड़े उड़ाता अपने ही जिगर के टुकड़ों
और
कहे ये है मुझसे मिलने का है रास्ता
अरे ओ शैतान
खुद को पहचान
ना कह खुद को इंसान
वो लाल भी जन्मा था तेरी मां सी कोख से
जो उजाड़ी तूने ले, मेरा नाम ।
कौन सा रास्ता कैसे रास्ता मेरे नाम
अरे इंसान बस अपने अन्दर झांक ।
सीमा स्मृति
कुदरत भी है हैरान
क्या मैंने ही बनाया था इंसान
अपनी ही नस्लों को करता बर्बाद
किस मुहँ से खुद को कहता इंसान
चिथड़े उड़ाता अपने ही जिगर के टुकड़ों
और
कहे ये है मुझसे मिलने का है रास्ता
अरे ओ शैतान
खुद को पहचान
ना कह खुद को इंसान
वो लाल भी जन्मा था तेरी मां सी कोख से
जो उजाड़ी तूने ले, मेरा नाम ।
कौन सा रास्ता कैसे रास्ता मेरे नाम
अरे इंसान बस अपने अन्दर झांक ।
सीमा स्मृति
मुलाकात
तुझसे मिलना
इक रवायत नहीं
किसी उम्र का
महकता सुरूर भी नहीं
बदली हवाओं में
थमा सा कोई नशा भी नहीं ।
तुझ से मिलना
जिन्दगी में मिले छालों को,
अपने ही हाथों से मरहम लगाना -सा
दर्पण में अक्स की पहचान सा
रात के बाद दिन से मुलाकात -सा
यथार्थ के टुकडों को सँजोना -सा
अतीत में थमे एहसास सा लगता है मुझे ।
सीमा स्मृति
कोहरा
क्यों पनपने लगती है
वो बेल, हमारे भीतर
ले कोहरे की छुहन ।
काटते रहे हर बार
टुकड़ा टुकड़ा करते बेल
जो पनपती हमारे भीतर
लिजलिजी केंचुए सी,
जिददी आक्टोपस सी,
गिरगट से रंग बदलती,
बढ़ती बे-खौफ हर पल
कभी कभी मुस्कराती
पूछती अनेक सवाल
और
डाल कोहरे की चादर
जकड़ती पूरा अस्तित्व
वो बेल जो पनपती हमारे भीतर।
सीमा समृति
वो बेल, हमारे भीतर
ले कोहरे की छुहन ।
काटते रहे हर बार
टुकड़ा टुकड़ा करते बेल
जो पनपती हमारे भीतर
लिजलिजी केंचुए सी,
जिददी आक्टोपस सी,
गिरगट से रंग बदलती,
बढ़ती बे-खौफ हर पल
कभी कभी मुस्कराती
पूछती अनेक सवाल
और
डाल कोहरे की चादर
जकड़ती पूरा अस्तित्व
वो बेल जो पनपती हमारे भीतर।
सीमा समृति
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