Friday, December 26, 2014

प्रतिबिम्‍ब

वो आया था मेरी जिन्‍दगी की सिलवटें पढ़ने
देख आईना नि:शब्‍द लौट गया।
                          सीमा स्‍मृति
  

Thursday, December 25, 2014

पहचान

देख ये है हैवानियत
कुदरत  भी  है हैरान
क्‍या मैंने ही बनाया था इंसान
अपनी ही नस्‍लों को करता बर्बाद
किस मुहँ  से खुद को कहता इंसान
चिथड़े उड़ाता अपने ही जिगर के टुकड़ों
और
कहे ये है मुझसे मिलने का है रास्‍ता
अरे ओ शैतान
खुद को पहचान
ना कह खुद को इंसान
वो लाल भी जन्‍मा था तेरी मां सी कोख से
जो उजाड़ी तूने ले, मेरा नाम ।
कौन सा रास्‍ता कैसे रास्‍ता मेरे नाम
अरे इंसान बस अपने अन्‍दर झांक ।

सीमा स्‍मृति

हाइगा


मुलाकात


तुझसे मिलना
इक रवायत नहीं
किसी उम्र का
महकता सुरूर भी नहीं
बदली हवाओं में
थमा सा कोई नशा भी नहीं ।
तुझ से मिलना
जिन्दगी में मिले छालों को,
अपने ही हाथों से मरहम लगाना -सा
दर्पण में अक्स की पहचान सा
रात के बाद दिन से मुलाकात -सा
यथार्थ के टुकडों को सँजोना -सा
अतीत में थमे एहसास सा लगता है मुझे ।

सीमा स्‍मृति


कोहरा

क्‍यों पनपने लगती है
वो बेल, हमारे भीतर 
ले कोहरे की छुहन ।

काटते  रहे  हर बार 
टुकड़ा टुकड़ा करते बेल
जो पनपती हमारे भीतर 
लिजलिजी केंचुए सी, 
जिददी आक्‍टोपस सी,  
गिरगट से रंग बदलती,  
बढ़ती बे-खौफ हर पल
कभी कभी मुस्‍कराती  
पूछती अनेक सवाल 
और 
डाल कोहरे की चादर 
जकड़ती पूरा अस्तित्‍व 
वो बेल जो पनपती हमारे भीतर।
 सीमा समृति 


हाइगा