Thursday, November 27, 2014

मन की बात- ऐसा क्‍यों?

कल शाम जब टेलीविजन चलाया ही था कि न्‍यूज आई कि फरीदाबाद के होली चाइल्‍ड स्‍कूल के एक तेरह साल के बच्‍चे ने जो आठंवी क्‍लास में पढ़ता था उसने स्‍कूल के बाथरूम में पैट्रोल डाल कर अपने को आग लगा ली। मन और सोच जैसे सून पड़ गए। ये क्‍या है? स्‍कूल में पानी की बोतल में पैट्रोल डाल कर ले गया । कसूर किस का है? मां बाप, टीचर, हमारा एजूकेश्‍न सिस्‍टम और समाज कौन है इस घटना का जिम्‍मेदार ? प्रश्‍नों का एक सैलाब हिला गया। हम बच्‍चों को क्‍या शिक्षा दे रहे हैं?आसान है एक –दूसरे पर दोष मंडना । मां-बाप आसानी से टीचर को दोषी कह सकते हैं और टीचर के पास एक क्‍लास में तीस चालीस बच्‍चे होने का दर्द और हर बच्‍चे पर वन टू वन ध्‍यान ना दे पाने का कारण । क्‍या कारण होगा कि एक इतना छोटा बच्‍चा जिसने अभी जीना भी शुरू नहीं किया वो जीवन को खत्‍म करना चाहता है? वो कौन सा दबाव होगा जो उस इस हद तक सोचने को मजबूर करे? हमारे समाज में,हमारी शिक्षा प्रणाली क्‍या इतनी संकुचित हो चुकी है? क्‍या हम बच्‍चों को रोबोट बना रहे हैं? क्‍या नम्‍बर की दौड़ में अंधे हम जीवन को ली देने वाले गहरे काले गढ्ढे नहीं देख पा रहे हैं?मन बार बार उस बाल मन की स्थित की कल्‍पना नहीं कर पा रहा कि उसे खुद को इस प्रकार दर्द देकर उस दबाब से मुक्ति पाना चाहता था। मन का हर तार, पूर्णत: तार-तार हो रहा है। शायद उस बच्‍चे के मन की बात समझने की बात तो दूर है किसी ने उसे कभी सुना ही नहीं। वरना इतना छोटा बच्‍चा यूं सोच नहीं पाता। वो पैंतालीस प्रतिशत जल गया परन्‍तु अब खतरे से बाहर है पर क्‍या उसका शेष जीवन खिल सकेगा।? शरीर के दाग चाहे मिट जाएं पर मन की सलवटें कभी क्‍या खत्‍म हो पाएंगी?
हम सभी को सोचना है कि कमी कहां है ? यह एक बच्‍चे कि  बात़ नहीं यह पूरे सिस्‍टम दोष है। इस भाग दौड़ और मैड मैटिरिलिस्‍टिक रेस में अंधे हम क्‍या खो रहे हैं? क्‍या हम बढि़या कपड़े हैं, मोबाइल है ,घूमना फिरना, मॉल और पिक्‍चर सभी कुछ है पाने के चक्‍कर में हम क्‍या खो रहे हैं  कभी सोचा। सिर्फ एक बार उस बाल मन के दर्द और दबाव को सोचेगें तो भौतिकता की हर चीज कुरूप नजर आयेगी।  हमें क्‍या बदलना है? ताकि इस प्रकार फिर कोई मासूम बचपन यूं ना जले।
सीमा स्‍मृति 

Friday, September 19, 2014

वक्‍त

देखती तुम्‍हारी तस्‍वीर 
वक्‍त जादू 
वक्‍त पहेली
वक्‍त नशा
वक्‍त सजा
वक्‍त मेहरबानी
वक्‍त निशानी 
वक्‍त तकदीर 
वक्‍त तामीर 
वक्‍त फरीयाद 
वक्‍त यकीन 
वक्‍त धोखा 
वक्‍त को किसने रोका
तुमको यूं देखा
तो याद आया
वक्‍त ने इतना सिखाया
मुझे ना अजमा बन्‍दे
जिन्‍दगी भी वक्‍त की गुलाम 
ऐ जिन्‍दगी तुझसे पहले 
वक्‍त की हर लय को 
सलाम सलाम ।
सीमा स्‍मृति


Sunday, July 13, 2014

शब्‍द

मैं खोजती शब्‍द.........
घर के हर कोने में
दरवाजों के पीछे
बंद संदूकों में
आंगन में, चौबारे पर
परछती पर
पलंग के नीचे
अलमारी के पीछे
रोज यहीं तो छिपा करते थे
कहां गए शब्‍द.......
बंद आंखों से भी
खोज लिया करती थी मैं शब्‍द
खामोशी में भी चुन लिया करती थी
आज खोजती शब्‍द.........
वक्‍त खटखटाता रहा दरवाजा
मैं खोजती रही शब्‍द
तुम्‍हें मिले तो बताना
वो शब्‍द जो जोड़ते खुद को खुद ही से
वो शब्‍द जो सुनने को आतुर रहें हम सब
वो शब्‍द जो जोड़ते मन के तार
जिन्‍हें सुन बजे सितार
वो शब्‍द जिन में बनावट नहीं
वो शब्‍द जो देते मरहम
वो शब्‍द जो खामोश कहते समझते दिल की बात
हां वही सभी शब्‍द
मिले तो बताना ।
सीमा स्‍मृति

Sunday, June 8, 2014

मुस्‍कान


    1
 हवा से हल्‍की
 बचपन की साथी
 क्‍यों खो जाती।
        2
 कभी कटीली
 लिपटी चश्‍नी संग
 बदले रंग ।
     3
 आंखो से बोले
 राज दिल के खोले
 ये हौले-हौले।
    4
 सभी पढ़ते
 ये बेबस मुस्‍कान
 बन अन्‍जान।
      5
 करे हैरान
कभी ये परेशान
फीकी मुस्‍कान।
   6
पहाड़ी नदी
सी, बहती जाए
मिठू मुस्‍कान।
    7
तहों में करे
कैद, दिल के राज
ये भी अंदाज।
     8
ये जहरीली
करे दिल पे वार
यूं बार-बार।
    9
जूही की कली
महकाती आंगन
भोली मुस्‍कान।
10

कभी ये आये
कभी सिमट जाये
खोजी मुस्‍कान  ।


माटी


   1
कान्‍हा ने खाई
माई सृष्टि दिखाई
लीला रचाई।
    2
माटी से बने
मिलेंगे माटी ही में
क्‍यों हैं अन्‍जान ।
    3
माटी का मोल
जीवन अनमोल
योद्धा के बोल।
   4
ललाट लगी
माटी देश की शान
बढ़ाती मान।
    5
सौंधी ये गंध
करे बावला मन
देती जीवन।
    6
हो ये बावरी
क्‍यों बनी किरकिरी
जीवनदात्री।
    7
हैं खेले खेल
बचपन की साथी
अब ना भाती।
    8
रूप अनेक
ये कारी भूरी लाल
देती दुलार।


 28.05.2014