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Tuesday, January 28, 2014

सुख : दुख

              
“राशि हैलो तुझे पता है कि अनिल के फादर की क्रिया आज है। दस दिन बात उसके बेटे की शादी है।” इंदु ने कहा।
“नहीं मुझे नहीं मालूम ।”
“अच्‍छा, चल मैं आ रही हूँ तू मुझे मैट्रो स्‍टेशन के पास मिलना ।तीन से चार बजे की क्रिया है1 मैनें तो बॉस से शॉट लीव ली है। तू भी पहुंच, फिर मिलते हैं तीन बजे ।” इंदु ने कहा।
“मैं शायद नहीं आ पाऊँगी।”
“अरे, नहीं डियर आ जा तुझे पता है, आजकल अनिल कितना इंफ्लुएंशियल आदमी हो गया है। वहां उसके पिता जी की क्रिया में जनरल मैनेजर, प्रबंध निदेशक और सारे टॉप बॉस आयेगें। सब से मिलने का इससे बड़ा ओकेजन नहीं मिलेगा।”
 इंदु और राशि क्रिया पर गई और चार बजे फ्री हो गई।
“चल इंदु मेरे घर चलते हैं, यहां से मेरा घर बहुत पास है।” राशि ने कहा ।
“नहीं यार घर चलती हूँ, रोज तो सात, साढ़े सात से पहले घर नहीं पहुंच पाती हूँ । आज मुझे घर पर जल्‍दी देख पिंकी बहुत खुश हो जाएगी । ऐसे आफिस से जल्‍दी घर आने के मौके रोज रोज कहां मिलते हैं।” 

सीमा स्‍मृति

Thursday, January 16, 2014

धुंध

क्‍या मुसीबत है, ये स्‍कूल वाले तो सर्दियों की  छुटियाँ आगे ही बढ़ाते जा रहे हैं। अब तो इतनी सर्दी भी नहीं है पहले अच्‍छे भले पन्‍द्र्ह तारिख को  स्‍कूल खुलने वाले थे और अब बीस तारिख को खुलेंगे। बस थोड़ी धुंध है। स्‍कूल टीचरस के तो मजें हैं। सारी मुसीबत तो हम मम्मियों की है। सारा रूटीन डिस्‍ट्रर्ब हो गया। ये बच्‍चे ना टाइम से सोते हैं, ना उठते हैं। मेरा तो सारा सिस्‍टम ही बिगड़ गया है। रश्मि शायद अपनी सहेली को फोन पर बोल रही थी।
रश्मि के एक्‍सप्रेशन को देख कर लग रहा था कि वह भी शायद रश्मि के विचारों से सहमत है।
ना, मैं योगा पर जा पाती हूँ। मेरी किटी भी इन आफतों के कारण मिस हो गई। पूरा दिन इन के साथ खटते रहो। रश्मि स्‍कूल वालों के प्रति नाराजगी प्रकट करती रही।
तभी न्‍यूज आई कि नोएडा के आर्मी पब्लिक स्‍कूल की बस धुंध के कारण डम्‍पर से टकरा गई । सभी बच्‍चों को चोट आई है और दो बच्‍चे गंभीर रूप से घायल हैं। जिन में से एक की टांग और एक का हाथ काटना पड़ा। मैं असमंज में था कि रश्मि को यह न्‍यूज बताऊ या वह खुद देख लेगी ।
सीमा स्‍मृति

16.01.2014


चेंज

                                चेंज-1
“अरे वाह! नीतू इस पिक में तो तुम बहुत सुन्‍दर लग रही हो, कौन सी जगह है ?” मैंने  पिक्‍स देखते हुए नीतू से पूछा।
“अरे ! मासी ये पिक आन दा वे टू वृंदावन है और ये ग्रेटर नोयडा एक्‍सप्रेस हाईवे की है। क्‍या मस्‍त टूर था। स्‍टीरियो फुल्ल वॉल्यूम में चलाया और मस्‍ती करते हुए गए। नीतू बोली ।
तुम लोग, लास्‍ट मंथ  भी तो गए थे । फिर दुबारा वृंदावन । मैंने आश्‍चर्य से पूछा।
चिल मासी, चेंज बहुत जरूरी है। वृंदावन का रास्‍ता बहुत अच्‍छा है। दिल्ली से पास भी है और मंदिर भी हो आते हैं। मम्‍मी भी खुश। नीतू ने कहा।
                                          चेंज-2
“भोला को फोन किया तुमने कब से गीजर खराब है। सर्दियां आने वाली हैं। फिर तुम लोग ही परेशान होगे”। मैंने सुधा से कहा।
जी, किया था । पर वो तो फोन ही नहीं उठता है। आजकल तो इन लोगों के नखारे भी बहुत हो गए हैं। सुधा ने अजीब सा एक्स्प्रेश्न देते हुए कहा।
मैं अभी घर से निकला ही था कि भोला मिल गया।
अरे! यार भोला घर का गीजर तो ठीक कर दो तुम्‍हारी भाभी बहुत परेशान हो रही हैं। मैंने कहा।
आज तो मुश्किल है। भाईसाहब अब तो एक महीने बात ही हो पायेगा ।
क्‍यों, क्‍या हुआ ? कोई खास कारण है मैंने आश्‍चर्य से पूछा।
भाई साहब आप भूल गए। मैं हर साल कावड ले कर, एक महीने के लिए हरिद्वार जाता हूँ।
हां, मैं भूल गया। यार तुम तो बड़े भगत  इंसान हो। पैदल जाते हो, वो भी इतनी दूर।
हां अच्‍छा लगता है जाना । सारी टेंश्‍न घर परिवार की चिक चिक से दूर । दोस्‍तों के साथ एक चेंज भी हो जाता है।

सीमा स्‍मृति
16.01.2014



Thursday, January 9, 2014

सो स्‍वीट.........


हम बहुत देर से ट्रैफिक जाम में फसे थे। एक घँटे  से ज्‍यादा हो गया था मगर कार एक इंच भी आगे नहीं बढ़ी थी । तभी मेरी नजर सड़क के किनारे एक बच्‍ची पर पड़ी, वो मिट्टी में खेल रही थी । साथ ही में उसकी एक छोटी सी बाल्‍टी सी रखी थी। शायद वो उसके भीख मांगने का बर्तन था। आस-पास और बच्‍चे भीख मांग रहे थे।
लड़की बहुत सुन्‍दर थी और मुझे उस से भी ज्‍यादा तो उसकी वो छोटी छोटी शरारतें लग रही थी कि मैं अपना ध्‍यान उससे हटा नहीं पा रही थी। कभी वो सूरज को अपनी अंगुलियों के झरोंकों से देखती, तो कभी सड़क के किनारे लगे फूल को सूँघती और उसके चेहरे एक मीठी सी मुस्‍कान सिमट जाती। फिर उसी फूल पर हाथ फेरती जैसे कोई मां अपने बच्‍चे को सहला रही हो।
कार में मेरे साथ मम्‍मी भी थी। मम्‍मी देखो कितनी प्‍यारी,कितनी स्‍वीट ! कितनी लवली बच्‍ची है। मैं मम्‍मी को दिखाने लगी। मम्‍मी ने अनमने मन से देखा और पापा से बात करने लगी।
इतने मैंने देखा कि वो एक छोटी सी डंडी ले कर जैसे कुछ लिखने की कोश्शि कर रही थी। अरे वाह उसने ‘अ’ लिखा। मै मंत्रमुग्‍ध सी उसे देख रही थी।
तभी मैंने देखा कि एक औरत गुस्‍से तमतमाती हुई आई और उस स्‍वीट सी बच्‍ची को मारने लगी और कुछ बोल भी रही थी। फिर उसका बर्तन उसे पकड़ाने लगी।
ओह!वो जरूर उसे भीख मांगने को कह रही थी। तभी वो औरत उस बच्‍ची का हाथ जोर से पकड़ हमारी कार के करीब आ रही थी और वो बच्‍ची जोर जोर से रो रही थी।
मैंने अपनी कार का शीशा नीचे किया और उसे बोली, “क्‍यों मार रही हो आप कितनी प्‍यारी और स्‍वीट बच्‍ची है।
तभी वो औरत चिल्‍ला कर और उस बच्‍ची को मेरे शीशे की ओर धकलेती हुई बोली,“,तू ले जा बहुत प्‍यारी लाग रही है तैने।”
मम्‍मी ने गुस्‍से से मेरी ओर देखा और जल्‍दी से कार का शीशा बन्‍द किया और कार चल पड़ी।
सीमा स्‍मृति

09.01.2014 

Tuesday, November 26, 2013

इलाज

क्‍या हुआ सर, आप आज आफिस के लिए लेट कैसे हो गए ?
अरे मैडम क्‍या बताये, आप तो जानती हो घर में हम सभी नौकरी करते हैं। ऐसे में नौकर भी पालना पड़ता है। बस उसी नौकर को बुखार हो गया। उसे डाक्‍टर के पास ले कर गया था इसी कारण लेट हो गया। उसे वापिस ऐजेंसी वालों के पास भी तो नहीं भेज सकते वरना पता नहीं वापिस आये या नहीं।
हां सर, ये तो है।
अब डाक्‍टर ने उसे ढेंगू बताया है। खून टेस्‍ट करवाया, प्लटेलेट थोड़े कम आये हैं।
सर कितने हैं ?
यही तीस हजार।
सर, ये तो बहुत कम हैं ।
मैडम, हम उसको दवाई के साथ ताजा जूस, दूध सब दे रहे हैं। ऐजेंसी वाले क्‍या ख्‍याल रखते जो हम रख रहे हैं। ठीक हो जाएगा । उस के बिना हमारा भी तो गुजारा नहीं हो सकता।  कुछ नहीं होगा। तीन चार दिन का  टाइम तो लगेगा पर ठीक हो जाएगा। मैनें  अखबार में पढ़ा था कि इस बार दिल्‍ली में ढ़ेगू से  मरने वालों की संख्‍या बहुत ही कम है।

सीमा स्‍मृति
30.10.2013


Wednesday, October 9, 2013

ऐसा भी होता है

 ऐसा भी होता है

निशा, क्‍या बात है, आरती अपना स्‍कूटर रोक कर क्‍या कह रही थी ?

अरे यार कुछ नहीं बस ये कि वो मुझे घर छोड़ देगी उस का घर मेरे घर के पास ही है।

फिर तुम गई क्‍यों नहीं ?

अरे यार एक बार गई थी, थोडी दूर तक जाने के बाद लगा कि सब लोग ऐसे देख रहे थे कि जैसे मैं और वो अजूबा हैं। 
उसका ये स्‍कूटर दोनों साइड के एक्‍सट्ररा पहियों के कारण देखते ही एहसास करवा देता हैं कि वो विकलांग है।

तो क्‍या हुआ?

नहीं यार लोग ऐसे घूर रहे थे जैसे मै भी------------मुझे तो बहुत शर्म आ रही थी। मैं तो उस के साथ कभी नहीं घर जा सकती। मैने तो आरती को बोल भी दिया है।

छः महीने बाद:

क्‍या हुआ निशा इतना गुस्‍से में क्‍यों लग रही हो ?
क्‍या बताऊ जब से आरती ने अपनी डिसेबिलटी के अनुसार एडजस्‍ट करवा कर नयी आटोमेटिक कार ली , इतनी धमंडी हो गई है कि आज मैने कहा कि तुम अगर घर जा रही तो मुझे छोड़ देनां । उसने साफ मना कर दिया कि वो घर नहीं जा रही है । जब से आरती कार में आने लगी है तो जाने खुद को क्‍या समझने लगी है । जमीन पर तो जैसे पांव ही नहीं हैं।शर्म भी नहीं आई कैसे साफ मना कर दिया, दोस्‍तो को कोई ऐसे भी मना करता है!!


'कैसे कहूँ क्‍यों.......?

गरिमा, आज तुम फिर लेट हो गई, क्‍या हुआ?
क्‍या बताऊ यार हम वर्किगं लेडीज की बहुत-सी समस्‍याएँ हैं। पहले तो आज सुबह आँख देर से खुली फिर तुझे तो पता है आज कल नवरात्रे शुरू हो चुके हैं और मैं सारे व्रत रखती हूँ! सुबह सुबह कितना काम करना पड़ता है। सब के लिए अलग अलग नाश्ते बनाओ। आशु के लिए पोहा बनाया। पावनी के लिए परांठे, पति देव के लिए बैड सैण्डविच। नवरात्रे में 'तीनों टाइम' आलू खाना मुझे बिलकुल पंसद नहीं तो अपने लिए सवांग के चावल की खीर बनाई, दोपहर लंच के लिए सवांग के चावल की वैजीटेबल वाली खि‍चड़ी बनाई और इन सब के लिए पनीर की सब्‍जी,कितना काम रहता ।

तुझे तो पता है, आजकल नवरात्रों मैं दो पाठ करती हूँ दुर्गा सप्‍तशती और दुर्गा चालीसा । वो मैं लेट तो हो रही थी उस पर सोने पर सुहागा आरती की कैसेट खराब हो गई, पति देव से कहा आरती आप कर दो ,ये कैसे हो,?उनका अखबार खत्‍म हो तब ना ।सारी मुसीबतें तो औरतों के लिए हैं ।

अब तू ही बता, बॉस को कैसे कहूँ मैं आज फिर क्‍यों ऑफिस के लिए लेट हो गई------?

दहेज प्रथा ( एक दौ तीन )

                       ‘एक’
रचना : प्रिया अब तो तुम्‍हारे मम्‍मी पापा ने भी तुम्‍हारे और रमन के प्‍यार को स्‍वीकृति
       दे दी है ,कब कर रहे हो तुम लोग शादी ?
प्रिया  : दीदी, कैसे करें पापा कहते हैं अगले साल तक ही शादी के लिए पैसों का            
        इंतजाम कर पायेगें ।
रचना  : प्रिया तुम ही बता रही थी कि रमन के माता पिता तो सिम्‍पल मैरिज के लिए
        तैयार हैं फिर तुम लोग मन्दिर में शादी क्‍यों नहीं  कर लेते हो क्‍यों एक साल
        वेसट कर रहे हो?
प्रिया :  क्‍या दीदी मेरे और रमन के भी कुछ अरमान हैं । शादी तो एक ही बार होनी 
        है। शादी का कुछ मजा तो आए।मैं तो जब़रदस्‍त बैंड बाजा वाली शादी करना
        चाहती हूँ, खूब डैकोरेशन, सभी रस्‍में मौज मस्‍ती। फिर पापा हमारे नये घर के
        लिए कुछ तो देगें। इंतजाम कर रहे हैं । सिम्‍पल शादी में क्‍या मिलने वाला हैं?  
                           ‘दौ’
मामा:   गीता, अपनी मम्‍मी से पूछ कर बताना मुझे तेरी शादी में क्‍या देना है, जो तेरी 
        मम्‍मी नहीं खरीदा वो मै खरीद दूंगा ।
गीता :  हॉं मामा जी पूछ कर बताती हूँ । मम्‍मी को मैने नये घर के सामान की लिस्‍ट
        दी है । देखो ना मामा जी रमेश के पापा तो सामान को मना कर रहे हैं । वो
        तो जयपुर में रहते हैं हम दोनों तो दिल्‍ली ही मे रहेगें क्‍या हमे अपने नये घर
        के लिए सामान नहीं चाहिए ? मम्‍मी पापा ने इसी दिन के लिए तो पैसे जमा
        किए हैं। मम्‍मी से पूछ कर आप को  बताती हूँ कि क्‍या खरीदने को रह गया
        है?
                             ‘तीन’
अनु :   दीदी दस तारिख को मैं विनय के साथ मंदिर में शादी कर रही हूँ ।
रचना : अरे वहा यह तो बहुत खुशी की बात है। भगवान तुम्‍‍हें सदा खुश रखें ।
अनु   : दीदी बस एक  मलाल रहेगा । घर वालों ने मुझ से रिश्‍ता तोड़ दिया है।
        किसी से कुछ मिलना मिलाना नहीं है ।घर वाले मान जाते तो कुछ कपडे लते
        घर के सामान का इंतजाम तो करते । अब तो सुई से लेकर फ्रिज तक हमें
        खुद खरीदना पडेगा ।     

सीमा ‘स्‍मृति’


‘उत्‍सव’

                                      

 महानगरों में प्रत्‍येक हाऊसिंग सोसाइटी के आस पास या कुछ दूरी पर प्राय: एक झुगी झोंपडी बस्‍ती होती है । वरना घरों में काम करने के लिए बाईयाँ कहाँ से मिलेगी। मुझे मालिकों और नौकरों का  रिश्‍ता परस्‍पर  परजीवी सा प्रतीत होता है। हमारी हाऊसिंग सोसाइटी से  कुछ दूरी पर, यमुना पुश्‍ते के पास एक झुगी झोंपड़ी बस्‍ती है।

उस दिन सुबह जब ऑंख खुली, न्‍यूज  पेपर में खबर पढ़ हैरान रह गई। यमुना पुश्‍ते की उस बस्‍ती में बी‍ती शाम आग लग गई । पूरी बस्‍ती जल गई । ये शुक्र था, किसी के हताहत होने की खबर नहीं थी । बालकनी से देखा तो मिसेज शर्मा कार में कुछ सामान रख रही थी । मुझ से रहा नहीं गया मैंने पूछा ही लिया ‘ मिसेज शर्मा, क्‍या कहीं जा रही हैं?”
हां पुश्‍ते तक । क्‍या आप को मालूम नहीं पुश्‍ते वाली  झुगी बस्‍ती में कल रात आग लग गई है। ‘मिसेज शर्मा ने कहा। ‘देखना आज कोई काम वाली नहीं आएगी’ । सब से बड़ा दर्द मिसेज शर्मा ने जल्‍द बांट  लिया । बस कुछ पुराने कपडे, बर्तन और थोड़ा सा खाने का सामान है सोचा वहां बांट आऊं । वहां तो सब जल कर खा़ख हो गया है। मिसेज शर्मा ने बताया।
 एक दूसरे का दर्द बांटने के कारण ही इंसानियत अभी जिन्‍दा है। मुझे आफिस के लिए तैयार होना था और आज तो काम वाली का इंतजार करना भी बेकार है यह सोच मै जल्‍द अन्‍दर आ गई। काम निपटा जब मैं आफिस के लिए निकली तो उसी बस्‍ती के आगे की मेन रोड से गुजर रही थी । देखा सब जल चुका था और बस्‍ती के कुछ लोग उस बचे झुलसे सामान से कुछ खोज रहे थे । दूसरी और क्‍या देखती हूँ कि कार वालों की लम्‍बी कतार थी  और ऐसा लगा  लोग आज सब कुछ दान कर देना चाहते थे । कितने जाने पहचाने चेहरे हमारी ही सोसाइटी के थे । क्‍या कपडे, बिस्‍कुट, रोटियां डबल रोटियां  बरतन,पुरानी चपलें, चादरें बाल्‍टी क्‍या क्‍या नहीं बांट रहे थे । यूं कि दानवीर होने की किसी प्रतियोगिता का कोई लाइव शो चल रहा हो ।

अचानक उसी शाम मुझे आफिस के काम से शहर से बाहर जाना पडा। चार दिन बाद  लौटने पर मुझे लगा कि मै भी  बस्‍ती में कुछ देकर आऊं यही सोच कार में कुछ सामान रख रही थी तो मिसेज मेहता ने कहा “बस्‍ती के लिए सामान ले जा रही हैं ।‘ अच्‍छा है हम सब को बस्‍ती वालों की सहायता करनी चाहिए। जितनी जल्‍दी ये लोग रिहैबलिटेट होगें उतनी जल्‍दी ये काम वालियां काम पर आएगी । वरना मुशिकल तो  हम  वर्किगं लेडिज की  की होने वाली है।“ 
मैं बस्‍ती में सामान बांट निकल ही रही थी कि बरबस मेरे कदम एक बच्‍ची की मीठी सी आवाज सुन थिर हो गए वो अपनी बडी बहन से बिस्‍कुट का डिब्‍बा मांगते मांगते कहा रही थी । दीदी, दो ना, मुझे वो वाला पैकेट दो । दीदी  आजकल  कितना बढिया सामान मिल रहा देखो, देखो मेरी नई फार्क । ये बिस्‍कुट तो बहुत स्‍वाद है, वाह मजा आ गया ओह,  ये तो खत्‍म  होने वाला है। दीदी, दीदी  बस्‍ती में दोबारा आग कब लगेगी ?????

सीमा स्‍मृति


ऐसा भी होता है


निशा, क्‍या बात है, आरती अपना स्‍कूटर रोक कर क्‍या कह रही थी ?

अरे यार कुछ नहीं बस ये कि वो मुझे घर छोड़ देगी उस का घर मेरे घर के पास ही है।

फिर तुम गई क्‍यों नहीं ?

अरे यार एक बार गई थी, थोडी दूर तक जाने के बाद लगा कि सब लोग ऐसे देख रहे थे कि जैसे मैं और वो अजूबा हैं। 
उसका ये स्‍कूटर दोनों साइड के एक्‍सट्ररा पहियों के कारण देखते ही एहसास करवा देता हैं कि वो विकलांग है।

तो क्‍या हुआ?

नहीं यार लोग ऐसे घूर रहे थे जैसे मै भी------------मुझे तो बहुत शर्म आ रही थी। मैं तो उस के साथ कभी नहीं घर जा सकती। मैने तो आरती को बोल भी दिया है।

छः महीने बाद:

क्‍या हुआ निशा इतना गुस्‍से में क्‍यों लग रही हो ?
क्‍या बताऊ जब से आरती ने अपनी डिसेबिलटी के अनुसार एडजस्‍ट करवा कर नयी आटोमेटिक कार ली , इतनी धमंडी हो गई है कि आज मैने कहा कि तुम अगर घर जा रही तो मुझे छोड़ देनां । उसने साफ मना कर दिया कि वो घर नहीं जा रही है । जब से आरती कार में आने लगी है तो जाने खुद को क्‍या समझने लगी है । जमीन पर तो जैसे पांव ही नहीं हैं।शर्म भी नहीं आई कैसे साफ मना कर दिया, दोस्‍तो को कोई ऐसे भी मना करता है!!


सहानुभूति



मीरा अस्‍पताल में है, मिसेज शर्मा ने  कहा ।

क्‍या हुआ मीरा को, मिसेज बंसल ने पूछा ।

 
मालूम नहीं ! कुछ तो हुआ है पन्‍द्रह दिन से एडमिट है।

कहां एडमिट है ?

अपोलो में ।

अरे वाह, वो तो फाइव स्‍टार अस्‍पताल है । फिर क्‍या, मीरा को क्‍या फर्क
पडता है ? सिंगल है । शादी हुई नहीं ।  उसने  कौन से बच्‍चे पालने है।
क्‍या करेगी इतना पैसा ! कौन सा साथ लेकर जाना हैं। गहने कपडे तो खरीदती
नहीं , उसे कम से इलाज तो फाइफ स्‍टार करवाना चाहिए । मिसेज बंसल ने कहा।
 
चल यार, कल आफिस से जल्‍दी निकल उसे देखने अस्‍पताल में चलते है ।
हां बढिया आइडिया है।  बॉस की फेव‍रिट स्‍टाफ है मीरा । उसकी बीमारी की
खबर सुन मेहता जी काफी द्रवित से लग रहे हैं। हमें अस्‍पताल जाने की
परमिशन के लिए मना नहीं करेगें।
 
सुन हम जरा जल्‍दी निकलने की परमिशन लेगे । अस्‍पताल में दस   पन्‍द्रह
मिनट बैठ  उसका हाल चाल पता कर, शापिंग करने  चलेगें । कुछ खायेंगे
पीयेगे। बहुत दिन हो गए कलेवा के दही भल्‍ले और गोल गप्‍पे खाये हुए।

वहा!! गुड आइडिया ,मेरे तो मुहं में पानी आ गया।

आफिस में  शाट लीव लेने का ऐसे मौके बहुत कम मिलते है।

सीमा स्‍मृति

परेशानी



पत्‍नी: आपको मालूम है, आज रात नौ बजे टी वी में आंतक एंवम् आंतकवादियों पर विशेष कार्यक्रम दिखाया जाएगा| वही आंतकवादी जिन्‍होने दिल्‍ली, अहमदाबाद और जयपुर में कैसा भयानक तांडव मचा दिया है। कैसे ये काम करते हैं, कैसे धर्म के नाम पर मासूमों की जान लेते हैं। उन परिवारों के बारे में भी दिखाया जाएगा जिन के घर पिछले शनिवार को बर्बाद हो गये थे। वो बच्‍चा जिस के हाथ में बम फट गया उसे सोच कर तो मेरी रूह कांप जाती है। कैसे इतने संवेदनाहीन हो गए हैं ये लोग? आप को मालूम, ये सभी आंतकवादी कितने पढ़े लिखे हैं? आज दिन में समाचार देख मेरे तो आंसू ही नहीं थम रहे थे।

पति महोदय: बस बस! मैं जानता हूं कि तुम बहुत जल्‍द परेशान हो जाती हो। तुम कर ही क्‍या सकती हो सिवा परेशान हो कर अपनी तबीयत खराब करने और कार्यक्रम देखकर दो वक्‍त जली हुई रोटियों और ज्‍यादा नमक की दाल खिलाने के। वैसे भी आज शनिवार है वीक एंड और सोमवार से तो बच्‍चों के भी एग्‍जाम शुरू हो जाएगें। इसी कारण आज आफिस से आते एक मूवी की सीडी लेकर आया था। चलो वो देखेंगे, वरना पूरा महीना पिक्‍चर नहीं देख पायेंगे छोडो ये रोना धोना आंतक वातंक।

पिक्‍चर देखो ऐश करो कुछ मूड बनाओ। मेरा तो आज मन है। तुम भी जाने कब दूसरों की बातों पर परेशान होना कब छोडोगी!!

--
सीमा स्‍मृति

Saturday, February 19, 2011

लघुकथा

‘भविष्‍य’

उस दिन आफिस में मुहरम की छुटी थी । सर्दी के मौसम में सूरज देवता की
पूरी मेहरबानी होने का मतलब है , कुछ मुंगफलियों हों, रेवडी गुड, खुला
आसमान और थोडी सी मौज मस्‍ती । सोचा बच्‍चों को इंडिया गेट लेकर जाया
जाए। वहां की खुली धूप में पि‍कनिक ही कर ली जाए। खाने और खेलने का सामान
बंधा , कार निकाली चले पडे ।
कार में बच्‍चे बात कर रहे थे बुआ ‘ इंडिया गेट के पास ही तो
राष्‍ट्रपति भवन है ना’ । मैने कहा , ‘हां’ । चलते चलते मैंने कार
राष्‍ट्रपति भवन की और मोड ली। मैं बच्‍चों को आस पास नजर आ रही सभी
इमारतों के विषय के बारे में बता रही थी।
तभी मेरा भतीजा, संसद भवन की आ‍ेर इशारा कर के बोला , बुआ वो क्‍या है?
‘बेटा, वो संसद भवन है।

संसद भवन क्‍या होता है? सनी बोला ।

बेटा हमारे देश का सारा काम काज इसी संसद भवन से होता है। हमारे द्वारा
चुने गए सभी नेता यही से देश का भविष्‍य निश्चित करते है।
अरे अरे बुआ , क्‍या यही वो जगह है, जहां वो सभी एक दूसरे को कुर्सी
मारते हैं, खूब हंगामा करते हैं, जो टी वी में भी आता है । मैने देखा था
क्‍या लडाई होती है। सनी, तुम भी देखना खूब मजा आता है कोई किसी की बात
नहीं सुनता है । एक आंटी चुप करने को कहती रहती है,और कोई चुप नहीं करता
है, पिंकी ने कहा।

बुआ चलो, बुआ चलो चल कर देखते है लडाई ।क्‍या लडाई अभी भी हो रही होगी, सनी ने कहा ।

मैं इंडिया गेट की तरफ गाडी मोंड चुकी थी और पिंकी द्वारा संसद की इस
पहचान पर स्‍तब्‍ध थी ।

सीमा ‘स्‍मृति’